पीआर श्रीजेश (PR Sreejesh) को भारतीय टीम के पूर्व कोच हरेंद्र सिंह (Harendra Singh) की खोज माना जाता है जो अंडर-14 के एक टूर्नामेंट में उनके प्रदर्शन से प्रभावित हो गए थे.

भारतीय हॉकी टीम के अनुभवी गोलकीपर हैं पीआर श्रीजेश

टोक्‍यो में आखिरी कुछ सेकंड में खेलप्रेमियों की धड़कनें मानो रुक सी गई थीं, लेकिन भारतीय गोलपोस्‍ट की दीवार पीआर श्रीजेश ने एक बार फिर उनके चेहरों पर मुस्‍कुराहट बिखेर दी. उनके इस बचाव के साथ ये भी तय हो गया कि भारतीय हॉकी टीम ओलिंपिक से 41 साल बाद पदक लेकर लौटेगी. पीआर श्रीजेश (PR Sreejesh) आज हॉकी की दुनिया में जाना-माना नाम है. वह भारतीय हॉकी टीम के सबसे अनुभवी खिलाड़ी होने के साथ-साथ टीम की कप्तानी भी कर चुके हैं. लगभग 13 साल के करियर में श्रीजेश ने न सिर्फ टीम को बड़ी जीत दिलाई हैं बल्कि खुद को एक शानदार गोलकीपर के तौर पर भी साबित किया है. वह साल 2014 के एशियन गेम्स (Asian Games) की गोल्ड मेडलिस्ट और साल 2014 के कॉमनवेल्थ की सिल्वर मेडलिस्ट टीम का हिस्सा रहे हैं. इन सब उपलब्धियों को हासिल करने के लिए पी आर श्रीजेश को बेहद ही मुश्किल सफर तय करना पड़ा. वह सफर जहां कभी उन्हें परिवार को छोड़ना पड़ा, कभी पैसों की कमी के कारण दर्द झेलना पड़ा तो कभी हिंदी न आने के कारण परेशानी झेलनी पड़ी. पर वह डटे रहे और कभी हिम्मत नहीं हारी.

पीआर श्रीजेश को भारतीय टीम के पूर्व कोच हरेंद्र सिंह (Harendra Singh) की खोज माना जाता है जो अंडर-14 के एक टूर्नामेंट में उनके प्रदर्शन से प्रभावित हो गए थे. साल 2004 में उन्होंने हरेंद्र सिंह के कोच रहते हुए ही जूनियर टीम में डेब्यू किया. इसके चार साल बाद ही उन्हें सीनियर टीम में मौका मिल गया था. साल 2011 से पहले उन्हें टीम में कम ही मौका मिला. लेकिन इसके बाद से वह टीम का नियमित हिस्सा हैं. टीम में फिलहाल वह जूनियर खिलाड़ियों के लिए प्ररेणा जिनके साथ वह अपना अनुभव बांटते हैं.

12 साल की उम्र में छोड़ा घर

श्रीजेश का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था. वह शुरुआत में हॉकी नहीं बल्कि एथलेटिक्स में दिलचस्पी रखते थे. इसके बाद उन्होंने वॉलीबॉल भी खेला. जिले स्तर पर शानदार खेल के कारण उन्हें तिरुवनंतपुरम के स्पोर्ट्स सेंट्रिक स्कूल में पढ़ने का मौका मिला. यह स्कूल उनके गांव से 200 किमी था. 12 साल की उम्र में अपने परिवार से घर से दूर रहना उनके लिए आसान फैसला नहीं था. वह भी एक ऐसे शहर में जहां वह किसी को नहीं जानते थे. हालांकि श्रीजेश पीछे नहीं हटे और स्कूल पहुंच गए.इसी स्कूल में उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया और कोच के कहने पर गोलकीपिंग शुरू की. फिर हरेंद्र सिंह की नजर में आए.

जूनियर कैंप में भी झेली कई मुश्किलें

हरेंद्र सिंह ने साल 2013 में दिल्ली में हुए जूनियर कैंप के लिए श्रीजेश का चयन किया. यहां भी उनके लिए सबकुछ आसान नहीं था. श्रीजेश के पिता ने किसी तरह 15 हजार रुपए का इंतजाम किया और बेटे को दिल्ली जाने के लिए गोलकीपर की किट दिलाई. हालांकि यह किट काफी आम थी. यही कारण था कि ट्रेनिंग के दौरान बाकी के बच्चे उनका मजाक उड़ाते थे. प्रैक्टिस के दौरान वह जानबूझकर उनके शरीर पर अटैक किया करते थे. इसी वजह से श्रीजेश अकसर दर्द में रहते थे. 15 साल की उम्र के बच्चे के लिए एक और बड़ी मुश्किल यह भी थी कि वह अच्छे से हिंदी बोलना नहीं जानते थे. यह भी एक कारण था कि टीम के बाकी खिलाड़ी उन्हें खुद से अलग ही रखते थे. इस सबका असर श्रीजेश के खेल पर कभी नहीं पड़ा था. अपने अपने खेल के दम पर पहले जूनियर और फिर सीनियर टीम में डेब्यू किया था.

एशियन गेम्‍स में बेहतरीन खेल

श्रीजेश अब तक करीब 240 मैच खेल चुके हैं. उनके लिए सबसे यादगार लम्हा रहा था 2014 का एशियन गेम्स जहां टीम को गोल्ड दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही थी. पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल मैच में उन्होंने दो पेनल्टी गोल सेव किए थे. छह फीट के श्रीजेश अटैकर्स को गोल करने का कम ही मौका देते हैं. साल 2017 में इंजरी के कारण एक साल तक बाहर रहने के बाद उन्होंने वापसी की.

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